Sunday, March 14, 2010

gubaar


1)
याद नहीं सूरत तेरी, सीरत तेरी पता नहीं
गँवा दिया मैंने बचपन, पर तेरी भी खता नहीं
कुछ भीगी भीगी हैं पलकें, दुनिया को ये बता रहीं
रो रहा है मेरा दिल…
माँ…आज याद तेरी सता रही.

2)
हम तो कब के सो गए होते…
इन अंधेरों में कहीं खो गए होते…
एक उनके आने की आस ने जगाये रक्खा है…
दहलीज़ पर हमने एक दिया जलाए रक्खा है.

3)
ताजगी फूलों सी, सादगी लहजे में छलके
जैसे मुट्ठी भर धूप सुबह की, आई हो पेड़ों से छन के
सिसके कभी तनहा, कभी भीड़ में किलकारी खनके
भर ले बाहों में कभी, कभी पट दे वो दरवाज़े मन के.

4)
पत्थर को पूजा उसने पर इंसा को मार डाला
बना तोह दी है मस्जिद, पर किसी का घर जला है डाला
हंस भी नहीं सकता मुस्तफा, मैं उसकी अक्ल पर…
मैं हूँ एक शराबी, वो धर्म का रखवाला.

5)
अपनी नादानी का मुझे आज एहसास होता है
पाके सबकुछ कोई कैसे उसे खोता है
मेरा तो जीवन तेरे ही नाम है पिया
जो तू नहीं संग तो साँसों का साथ भी कहीं खोता है
रूठ के चले गए तुम, मेरी एक न सुनी
फिर भी तुम्हें पुकार यह दिल यहाँ रोता है
जो आये तुम्हारे क़दमों की आहट तो लौट आये सांसें
आके इक बार तो देखो यह चमत्कार कैसे होता है.

6)
जाने उस मूरत में किसी ने क्या देखा
मैंने तो पत्थर पत्थर में बसा खुदा देखा
यही मज़हब है सिखाता तो मुस्तफा मैं काफिर ही सही
की तेरे दर को भी मैंने खून से सना देखा.

1 comments:

Ruchi Joshi said...

My lame prose after this brilliant poetry would be making a fool of myself! I leave it at that...