Monday, March 22, 2010

गुबार २

१)
घर से तो निकले थे तेरी इबादत को हम
रस्ते में पर खुदा उनसे मुहब्बत हो गयी।

२)
महफ़िल में तेरी सब ने हमसे किये सवाल जवाब
साकी ने नाम तक न पूछा और जाम थमा दिया।

३)
या तो इस दुनिया की सुनो और मेरे दिल को तोड़ दो
या फिर तुम इस दुनिया की सुनना ही छोड़ दो
ये इश्क नहीं आसान इक आग का दरिया है
जलने का जो है डर तो इश्क करना छोड़ दो।

४)
तेरे दर पर आया तो जगह न मिली मुझको
खुदाया शुक्र है साकी का जो उसने पनाह दे दी।

0 comments: